संस्कृत श्लोक अर्थ सहित

संस्कृत विश्व की सबसे प्राचीन भाषा है और इस भाषा को भारतीय संस्कृति का मूल आधार माना जाता है |  संस्कृत भाषा को देवभाषा कहा भी जाता है, और यह भाषा ईसा से लगभग 5000 वर्ष पहले से बोली जा रही है | यहाँ तक कि सभी ग्रन्थ संस्कृत में ही लिखे गये है | संस्कृत आज भी हमारे देश की राजभाषा है, हालांकि वर्तमान समय में संस्कृत भाषा का प्रयोग बोलचाल की भाषा में न के बराबर रह गया है |

परन्तु आज भी विवाह, पूजा –पाठ या किसी भी प्रकार के शुभ कार्य एवं कर्मकांड में संस्कृत में मन्त्रों का उच्चारण किया जाता है, जो कि श्लोक के रूप में होते है |  इन श्लोको में मनुष्य के जीवन जीने के मूल्य, उससे होने वाले लाभ तथा जीवन की नीतियों के बारे में बताया गया हैं, जो हमें जीवन को उच्च शिखर तक ले जाते है। आज हम आपको यहाँ कुछ महत्वपूर्ण श्लोको और उनके अर्थ के बारें में बता रहे है |

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संस्कृत श्लोक अर्थ सहित (Sanskrit Slokas with Meaning)

1.स्वभावो नोपदेशेन शक्यते कर्तुमन्यथा ।
सुतप्तमपि पानीयं पुनर्गच्छति शीतताम् ॥

अर्थ-इस श्लोक का अर्थ है कि किसी भी व्यक्ति का जो मूल स्वभाव होता है, वह कभी नही बदलता है, चाहे आप उसे कितना भी समझाएं और किनती भी सलाह दे | यह ठीक उसी प्रकार से होता है जैसे पानी को आग में उबालनें पर वह गर्म हो जाता है और खौलनें लगता है परन्तु कुछ समय पश्चात वह अपनी पुरानी अवस्था में आ जाता है |    

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2.अनाहूतः प्रविशति अपृष्टो बहु भाषते ।
अविश्वस्ते विश्वसिति मूढचेता नराधमः ॥

अर्थ-बिना बुलाये ही किसी भी स्थान पर चले जाना और बिना कुछ पूछें बोलना, जिन पर  विश्वास नहीं किया जा सकता, ऐसे लोगो पर विश्वास करना यह सभी मूर्ख और बुरे लोगों के लक्षण हैं | 

3.यस्तु सञ्चरते देशान् सेवते यस्तु पण्डितान् ।
तस्य विस्तारिता बुद्धिस्तैलबिन्दुरिवाम्भसि ॥

अर्थ- ऐसे व्यक्ति जो विभिन्न देशो में यात्रा करते है और विद्वान लोगो की सेवा करते है, उनकी बौद्धिक क्षमता का विस्तार ठीक उसी तरह से होता है, जिस प्रकार तेल का एक बून्द पानी में गिरने के बाद फैल जाता है |  

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4.कार्यार्थी भजते लोकं यावत्कार्य न सिद्धति ।
उत्तीर्णे च परे पारे नौकायां किं प्रयोजनम् ॥

अर्थ- जब तक किसी व्यक्ति का कार्य पूरा नहीं होता है तब तक वह दूसरों की प्रशंसा करते हैं और जैसे ही कार्य पूरा हो जाता है, लोग दूसरे व्यक्ति को भूल जाते हैं | यह ठीक उसी तरह होता है जैसे-नदी पार करने के बाद नाव का कोई उपयोग नहीं रह जाता है | कहनें का आशय यह है कि अपना स्वार्थ सिद्ध हो जानें पर उस व्यक्ति को भूल जाते है |  

5.न चोरहार्य न राजहार्य न भ्रतृभाज्यं न च भारकारि ।
व्यये कृते वर्धति एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम् ॥

अर्थ-इस श्लोक का अर्थ है, कि विद्या एक ऐसी चीज है जिसे न ही कोई चोर चुरा सकता है, न ही राजा छीन सकता है और न ही भाइयों के बीच बंटवारा हो सकता है और यह एक ऐसा धन है जो सदेव खर्च करनें पर बढ़ता है | यह विद्या रूपी धन, सभी धनों से श्रेष्ठ है |

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6.विद्वत्वं च नृपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन ।
स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते ॥

अर्थ-एक विद्वान और एक राजा के बीच किसी प्रकार से तुलना नहीं की जा सकती, क्योंकि राजा सिर्फ अपनें ही राज्य में सम्मान मिलता है, जबकि विद्वान कहीं भी जाये उसे हर जगह सम्मान मिलता है | 

7.उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगा:।।

अर्थ-कोई भी कार्य परिश्रम करनें से ही पूरा होता है, उस कार्य को सिर्फ सोचनें या इच्छा करनें से वह कार्य पूरा नही होता है, जिस प्रकार एक सोते हुए सिंह के मुख में हिरण स्वयं नहीं आता, उसके लिए सिंह को परिश्रम करना पड़ता है |

बड़ा मंगल (BadaMangal) क्या है

8.अनादरो विलम्बश्च वै मुख्यम निष्ठुर वचनम।
पश्चतपश्च पञ्चापि दानस्य दूषणानि च।।

अर्थ- किसी का भी अनादर कर देना अर्थात कठोर वचन बोलकर देना, मुंह फेर कर देना, देरी से देना और देनें के पश्चाताप होना यह सभी पांच क्रियाएं दान को दूषित कर देती है।

9.श्रोत्रं श्रुतेनैव न कुंडलेन, दानेन पाणिर्न तु कंकणेन।
विभाति कायः करुणापराणां, परोपकारैर्न तु चन्दनेन।।

अर्थ-कानों में कुंडल पहन लेना अर्थात अपनें आप को आभूषणों से सुसज्जित कर लेने आपको शोभा नहीं बढ़ती बल्कि ज्ञान की बातें सुनने से होती है। हाथों की सुन्दरता कंगन पहनने से नहीं होती बल्कि दान देने से होती है।  एक सज्जन का शरीर भी चन्दन से नहीं बल्कि दूसरों के हित में किये गये कार्यों से शोभायमान होता है।

चार धाम (Char Dham) यात्रा क्या है

10.अश्वस्य भूषणं वेगो मत्तं स्याद् गजभूषणं।
चातुर्यम् भूषणं नार्या उद्योगो नरभूषणं।।

अर्थ-एक घोड़े की शोभा उसकी तेज दौड़ने की गति से होती है और हाथी की शोभा उसकी मदमस्त चाल से होती है। एक स्त्री की शोभा कार्यों में दक्षता के कारण और पुरुषों की उनकी उद्योगशीलता के कारण होती है।

11.परो अपि हितवान् बन्धुः बन्धुः अपि अहितः परः।
अहितः देहजः व्याधिः हितम् आरण्यं औषधम्।।

अर्थ-यदि कोई अपरिचित व्यक्ति आपकी सहायता करता है, तो उस व्यक्ति को अपनें घर के सदस्य की तरह सम्मान दें और यदि आपके घर का सदस्य ही आपको नुकसान देना शुरू कर दे तो उसे बिलकुल भी महत्व नहीं देना चाहिए | जिस प्रकार शरीर के किसी अंग में चोट लग जानें के कारण हमें बहुत तकलीफ पहुंचती है जबकि जंगल में उगी हुई औषधि हमारे लिए बहुत ही लाभकारी होती है |

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12.सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्।
वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव संपदः।।

अर्थ- किसी भी कार्य को आवेश में आ कर या बिना सोचे समझे नहीं करना चाहिए, क्योंकि विवेक का शून्य होना विपत्तियों को बुलावा देना है | जबकि जो व्यक्ति सोंच-समझकर कार्य करता है, ऐसे व्यक्तियों को माँ लक्ष्मी स्वयं ही उसका चुनाव कर लेती है।

13.माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा ।।

अर्थ- ऐसे माता-पिता या अभिभावक जो अपन बच्चों को नहीं पढ़ाते है अर्थात शिक्षा अध्ययन के लिए नहीं भेजते है वह अपनें बच्चों के लिए एक शत्रु के समान है | जिस प्रकार विद्वान व्यक्तियों की सभा में एक निरक्षर व्यक्ति को कभी सम्मान नहीं मिल सकता वह हंसो के बीच एक बगुले की तरह होता है |

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14.मूर्खस्य पञ्च चिह्नानि गर्वो दुर्वचनं तथा।
क्रोधश्च दृढवादश्च परवाक्येष्वनादरः।।

अर्थ-एक मूर्ख व्यक्ति में  क्रोध,घमण्ड, दुष्टता पूर्वक वार्तालाप,जिद्दी तर्क तथा लोगों के लिए सम्मान में कमी यह पांच लक्षण होते है | इन बातों से यह सिद्ध कर देते है, कि वह किस श्रेणी के व्यक्ति है |  

15.देवो रुष्टे गुरुस्त्राता गुरो रुष्टे न कश्चन:।
गुरुस्त्राता गुरुस्त्राता गुरुस्त्राता न संशयः।।

अर्थ-यदि भाग्य रूठ जाता है तो ऐसे समय में गुरु आपकी रक्षा करते है, परन्तु यदि गुरु रूठ जाएँ तो उस समय आपके साथ खड़ा होनें वाला कोई नही होता | इसलिए इसमें कोई संदेह नहीं है कि गुरू ही शिक्षक है और गुरू ही रक्षक है |  

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