भगवत गीता श्लोक अर्थ



भागवत गीता को श्रीमद्भागवत गीता कहा जाता है। श्रीमद्भागवत गीता में श्री कृष्ण के द्वारा महाभारत के युद्ध के दरमियान दिए गए विभिन्न उपदेश शामिल है जिनका अर्थ हर इंसान को अवश्य समझना चाहिए।

श्री कृष्ण के द्वारा श्रीमद् भागवत गीता में जो भी उपदेश दिए गए हैं वह इंसानों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है, कहा जाता है गीता के मर्म को समझ लेता है उसका जीवन तर जाता है। आज हम इस लेख में भगवत गीता श्लोक अर्थ सहित जानेंगे।

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Bhagwat Geeta Shlok in Hindi and Sanskrit

श्रीमद भगवत गीता जीवन का सार है। अगर कोई व्यक्ति दैनिक तौर पर भागवत गीता पड़ता है तो इससे उसे कई फायदे होते हैं। उसे मानसिक शांति मिलती है साथ ही उसे आध्यात्मिक यात्रा पर जाने का मन भी करता है।

आप भी श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन दैनिक तौर पर करते हैं तो आपको भगवान श्री कृष्ण के उद्देश्यों के बारे में तथा धर्म के बारे में और अधर्म के बारे में जानने का सौभाग्य प्राप्त होता है।

भगवत गीता के श्लोक हिंदी अर्थ सहित | Bhagwat Geeta Shlok With Meaning In Hindi

1: न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्‌ ।

कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥

भावार्थ: यह बिल्कुल तय है कि कोई भी इंसान किसी भी समय बिना कर्म किए हुए बिल्कुल भी नहीं रह सकता है। सभी जीव और इंसान समुदाय को प्रकृति के द्वारा कर्म करने के लिए प्रतिबंधित किया गया है।

2: प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।

अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥

भावार्थ: श्री कृष्ण कह रहे हैं कि हे पार्थ इस दुनिया में सभी कर्म प्रकृति के गुण के द्वारा ही किए जाते हैं। जो इंसान यह विचार करता है कि “मैं कर्ता हूं” उसका ह्रदय घमंड से भरपूर होता है। ऐसे मनुष्य को अज्ञानी कहा जाता है।

3: कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः

पृच्छामि त्वां धर्म सम्मूढचेताः |

यच्छ्रेयः स्यान्निश्र्चितं ब्रूहि तन्मे

शिष्यस्तेSहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ||

भावार्थ: अर्जुन के द्वारा श्री कृष्ण से कहा जा रहा है कि मैं अपनी कमजोरी की वजह से अपना संयम खो रहा हूं और मैं अपने सभी दायित्व को भी भूल रहा हूं। आप मुझे राह दिखाएं कि मेरे लिए क्या उचित है क्योंकि मैं आपका शिष्य हूं और मैं अब आपकी शरण में आ गया हूं। मुझे ज्ञान और उपदेश दें।

4: न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या-

द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् |

अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं

राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ||

भावार्थ: अर्जुन कह रहे हैं कि मेरी इंद्रियों और मेरी जान को सुख देने वाले इस दुख से निकलने का मुझे ना तो कोई रास्ता दिखाई दे रहा है ना ही कोई साधन दिखाई दे रहा है। जिस प्रकार से स्वर्ग पर देवता रहते हैं उसी प्रकार से धन-संपत्ति से परिपूर्ण धरती का राजपाट हासिल करने के पश्चात भी मैं इस दुख से बाहर नहीं निकल सकूंगा।

5: सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ||

भावार्थ: श्री कृष्ण के द्वारा अर्जुन से कहा जा रहा है कि हे अर्जुन तुम सफलता और असफलता की बिल्कुल भी चिंता ना करो बल्कि इसकी चिंता को छोड़कर के तुम समर्पित भाव से समभाव हो जाओ और अपने कर्म का पालन करो। इसे ही समता की भावना योग कहा जाएगा।

6: दुरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धञ्जय

बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ||

भावार्थ: श्री कृष्ण के द्वारा अर्जुन से कहा जा रहा है कि हे पार्थ तुम चैतन्य और अपनी बुद्धि से खराब कर्मों से दूरी बना कर रखो और समर्पित भाव से ईश्वर की शरण में चले जाओ क्योंकि जो व्यक्ति अपने कर्मों के फल को भोगने का इच्छुक होता है वह व्यक्ति लालची व्यक्ति की श्रेणी में आता है।

7: कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः |

जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ||

भावार्थ: श्री कृष्ण के द्वारा अर्जुन से कहा जा रहा है कि भगवान की आराधना में अपने आप को खो कर के बड़े-बड़े साधु सन्यासी और ऋषि मुनि अपने आपको इस संसार के कर्म और फल के बंधन से मुक्त कर चुके हैं। और उन्हें जिंदगी और मृत्यु के बंधन से भी मुक्ति की प्राप्ति हो चुकी है। ऐसे व्यक्ति भगवान के पास जाकर के आनंदमय हो जाते हैं और सभी दुखों से दूर हो जाते हैं।

8: यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति |

तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ||

भावार्थ: श्री कृष्ण कह रहे हैं कि जब तुम्हारी सोच मोह माया के जंगलों को पार कर लेगी तब तुमने जो सुना हुआ है या फिर जो भी सुनने योग्य है उससे तुम विरक्त हो जाओगे।

9: श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्र्चला |

समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ||

भावार्थ: गीता के इस श्लोक में श्री कृष्ण के द्वारा कहा जा रहा है कि पार्थ जब तुम्हारी सोच बिना कर्मों के फल से प्रभावित हुए साथ ही वेदों के अंदर मौजूद ज्ञान से विचलित हुए बिना आत्म साक्षात्कार की समाधि में स्थाई हो जाएगा तब तुम्हें दिव्य चेतना की प्राप्ति भी हो जाएगी।

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10: श्रीभगवानुवाच

प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् |

आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ||

भावार्थ: श्री कृष्ण के द्वारा कहा जा रहा है कि जब किसी इंसान के द्वारा समस्त इंद्रियों को छोड़ दिया जाता है और उन पर विजय हासिल कर ली जाती है। तथा जब इस प्रकार से विशुद्ध होकर इंसान का मन आत्म संतोष की प्राप्ति कर लेता है तब उस इंसान को विशुद्ध दिव्य चेतना भी हासिल हो जाती है।

11: पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।

वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च ॥

भावार्थ: अर्जुन से श्री कृष्ण कह रहे हैं कि इस पूरी दुनिया का धाता अर्थात दुनिया को धारण करने वाला, सभी लोगों के कर्मों का फल प्रदान करने वाला तथा ओंकार, जानने लायक, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, माता-पिता सभी मैं ही हूं।

12: गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्‌ ।

प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्‌॥

भावार्थ: श्री कृष्ण कह रहे हैं कि हे पार्थ इस दुनिया में मिलने लायक, सब को पोषण देने वाला, पूरी दुनिया का मालिक, सब की उत्पत्ति और सब के प्रलय तथा समस्त निधान और अविनाशी का कारण भी मैं स्वयं ही हूं।

13: तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्‌णाम्युत्सृजामि च ।

अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥

भावार्थ: श्री कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि सूरज की गर्मी भी मैं हूं और मेरे द्वारा ही बरसात करवाई जाती है तथा बरसात का आकर्षण भी मैं स्वयं ही हूं। हे पार्थ मैं मृत्यु भी हूं तथा अमृत भी हूं, मैं सत्य और असत्य भी हूं।

14: नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।

न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥

भावार्थ: श्री कृष्ण कह रहे हैं कि आत्मा अजर अमर होती है। इसे ना तो जलाया जा सकता है ना ही इसे पानी से गिला किया जा सकता है और ना ही इसे हवा में सुखाया जा सकता है ना ही किसी हथियार के द्वारा इस के टुकड़े किए जा सकते हैं क्योंकि आत्मा अविनाशी है।

15: यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

भावार्थ: गीता के इस श्लोक में कहा गया है कि इस दुनिया पर जब-जब भी धर्म का विनाश होना प्रारंभ होगा और अधर्म लगातार बढ़ता जाएगा तब तब मैं धर्म की रक्षा करने के लिए और अधर्म का संहार करने के लिए अवतार लेता रहूंगा।

16: कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

भावार्थ: भागवत गीता के इस श्लोक के द्वारा श्री कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि बेशक कर्म तुम्हारा ही अधिकार है परंतु फल की इच्छा करना तुम्हारा अधिकार बिल्कुल भी नहीं है। क्योंकि तुम सिर्फ अपने कर्म पर ध्यान दो और फल की चिंता जरा भी नहीं करो क्योंकि तुम्हारे द्वारा किया गया कर्म ही मुझे तुम्हें फल देने के लिए प्रेरित करेगा क्योंकि फल देने का काम मेरा है।

17: परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥

भावार्थ: श्री कृष्ण के द्वारा अर्जुन से कहा जा रहा है कि मैं लगातार इस धरती पर इसलिए युगो युगो से जन्म लेता आया हूं ताकि मैं साधु सन्यासियों की रक्षा कर सकू साथ ही मैं दुष्ट लोगों का वध कर सकूं और धरती पर धर्म की स्थापना कर सकूं।

18: गुरूनहत्वा हि महानुभवान श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके |

हत्वार्थकामांस्तु गुरुनिहैव भुञ्जीय भोगान्रुधिरप्रदिग्धान् ||

भावार्थ: महाभारत जैसे भयंकर युद्ध के दरमियान जब अर्जुन के ही परिचित और उनके गुरुजन उनके सामने युद्ध लड़ने के लिए खड़े हो गए थे तब अर्जुन का मन काफी दुखी हो गया था। और उन्होंने दुखी मन से श्री कृष्ण से कहा कि अपने गुरुओं का वध करके जीने से अच्छा है कि मैं भीख मांग करके अपनी जिंदगी व्यतीत कर लूं।

भले ही मेरे गुरु जन और मेरे परिचित लोग लालच की वजह से अधर्म का साथ दे रहे हैं परंतु है तो वह मेरे गुरु ही और मेरे परिचित लोग। अगर मैं उनका विनाश कर के कुछ प्राप्त भी कर लूंगा तो वह सब भी उनके खून से ही सना हुआ होगा।

19: न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरियो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयु: |

यानेव हत्वा न जिजीविषाम- स्तेSवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ||

भावार्थ:अर्जुन कह रहे हैं कि मुझे उचित और अनुचित का बिल्कुल भी पता नहीं है। मुझे नहीं पता है कि हम सामने वाले से युद्ध जीतना चाहते हैं या फिर हम उनके द्वारा जीते जाना चाहते हैं। धृतराष्ट्र के पुत्रों का वध करके हम कभी भी जिंदा नहीं रहना चाहेंगे फिर भी वह सभी हमारे सामने युद्ध लड़ने के लिए खड़े हुए हैं।

20: क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।

स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥

भावार्थ: अर्जुन से भगवान श्री कृष्ण कह रहे हैं कि गुस्सा करने से दिमाग कमजोर होता है और व्यक्ति की याददाश्त पर भी असर पड़ता है। इस प्रकार से मनुष्य की सद्बुद्धि खराब हो जाती है और जब किसी मनुष्य की बुद्धि खराब हो जाती है तो उस मनुष्य का भी विनाश होना प्रारंभ हो जाता है।

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21: यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

भावार्थ: श्री कृष्ण कह रहे हैं कि हे अर्जुन एक श्रेष्ठ व्यक्ति के द्वारा जो कर्म किया जाता है उसी व्यक्ति के कर्म का दूसरे व्यक्ति के द्वारा भी अनुसरण किया जाता है। ऐसा व्यक्ति जो भी काम करता है अन्य लोग भी उसके काम को सही मानते हैं और वैसा ही काम करते हैं।

22: ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।

सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥

भावार्थ:श्री कृष्ण कह रहे हैं कि अर्जुन किसी इंसान के द्वारा अगर लगातार विषयों और कामनाओं के बारे में विचार किया जाता है तो इंसान को उसके साथ गहरा लगाव हो जाता है और यह लगाव ही व्यक्ति के मन में इच्छा पैदा करता है और जब इच्छा पैदा होती है तो क्रोध भी जन्म लेता है।

23: हतो वा प्राप्यसि स्वर्गम्, जित्वा वा भोक्ष्यसे महिम्।

तस्मात् उत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय:॥

भावार्थ:श्री कृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन अगर युद्ध करने के दरमियान तुम वीरगति को हासिल हो जाते हो तो तुम्हें स्वर्गलोक प्राप्त होगा और अगर युद्ध तुम जीत जाते हो तो भी इस धरती पर राजसी ठाठ बाट प्राप्त होगा। इसलिए चिंता ना करो और युद्ध के लिए शस्त्र उठाओ।

24: बहूनि में व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।

तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप॥

भावार्थ: श्री कृष्णा कह रहे हैं कि हे अर्जुन हमारा यही सिर्फ जन्म नहीं है बल्कि हमने इसके पहले भी हजारो जन्म ले चुके हैं। तुम्हारे कई जन्म हो चुके हैं और मेरे भी परंतु मुझे अपने सभी जन्मो का ज्ञान है परंतु तुम्हें अपने सभी जन्मो का ज्ञान नहीं है।

25: अजो अपि सन्नव्यायात्मा भूतानामिश्वरोमपि सन ।

प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ॥

भावार्थ: श्री कृष्ण कह रहे हैं कि हे पार्थ मैं कभी ना खत्म होने वाला आत्मा हूं। मेरे द्वारा ही प्रकृति को संचालित किया जाता है और सारी सृष्टि, धरती का स्वामी मैं खुद ही हूं। मैं योग माया के द्वारा धरती पर अवतरित हुआ हूं।

26: प्रकृतिम स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुन: पुन: ।

भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशम प्रकृतेर्वशात॥

भावार्थ: गीता के चौथे अध्याय में श्री कृष्ण के द्वारा कहा जा रहा है कि सारी प्रकृति को मैं अपने वश में करके प्रकृति पर मौजूद सभी जीवो को उनके कर्मों के हिसाब से मैं बारंबार पैदा करता हूं अर्थात उनकी रचना करता हूं।

27: अनाश्रित: कर्मफलम कार्यम कर्म करोति य:।

स: संन्यासी च योगी न निरग्निर्ना चाक्रिया:।।

भावार्थ:श्री कृष्ण कह रहे हैं कि हे अर्जुन जिस इंसान के द्वारा बिना कर्म फल की इच्छा किए हुए अपना कर्म किया जाता है और अपनी जिम्मेदारी मान करके सत्कर्म किया जाता है वही इंसान योगी होता है और जो सत्कर्म नहीं कर सकता है वह इंसान कदापि संत कहलाने के लायक नहीं होता है।

28: सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥

भावार्थ:श्री कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि हे अर्जुन दुनिया के सभी धर्मों को छोड़कर के अर्थात सभी प्रकार की मोह माया को त्याग करके तुम मेरी शरण में चले जाओ क्योंकि मैं ही तुम्हें तुम्हारे पापों से मुक्ति दिलाने में सक्षम हूं। इसलिए चिंता व्यर्थ ना करो।

29: श्रद्धावान्ल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।

ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥

भावार्थ:श्री कृष्ण के द्वारा अर्जुन से कहा जा रहा है कि ईश्वर में श्रद्धा रखने वाला इंसान अपनी इंद्रियों को अपने काबू में करके ज्ञान अर्जित कर सकता है और ऐसा ज्ञान प्राप्त करने वाला व्यक्ति काफी जल्दी शांति को भी प्राप्त कर लेता है।

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