खालिस्तान आंदोलन क्या है

नए कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग करते हुए किसानों का प्रदर्शन लगातार जारी है | इस आन्दोलन को शुरू हुए लगभग तीन सप्ताह से अधिक समय बीत चुका है, परन्तु इस मुद्दे पर अभी तक कोई निष्कर्ष नहीं निकला है | हालाँकि किसान आंदोलन को लेकर केंद्र की मोदी सरकार किसान संगठनों से बातचीत कर बीच का रास्ता निकालने का हर संभव प्रयास कर रही है, परन्तु किसान आंदोलन केबीच ‘खालिस्तान’ शब्द की चर्चा जोर-शोर से हो रही है |

कई राजनीतिक पार्टियों और संगठनयह आरोप लगा रहे है, कि किसान आंदोलन के बीच खालिस्तान विचाराधारा से जुड़े कई संगठन सक्रिय हो गये है, और वह अपनें इस आन्दोलन के जरिये वह अपना प्रचार-प्रसार कर रहे हैं, जिसे खालिस्तान आंदोलन कहा जा रहा है | ऐसे में प्रश्न यह उठता है, कि आखिर खालिस्तान आंदोलन क्या है? तो आईये जानते है, खालिस्तान आंदोलन क्या है और इसके इतिहास के बारें में |  

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खालिस्तान आंदोलन का क्या मतलब है?

यदि आप यह सोंच रहे है, कि खालिस्तान का मुद्दा किसान आन्दोलन से शुरू हुआ है, तो यह मुद्दा किसान आंदोलन से नहीं बल्कि देश के बंटवारे के समय से चला आ रहा है | 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हमारा देश दो हिस्सों में विभाजित हुआ, इस विभाजन में पंजाब सूबे के बंटवारा हुआ, जिसमें से पंजाब का एक बड़ा भाग पाकिस्तान में चला गया, जिसमें लाहौर भी शामिल था जो किसी समय सिख साम्राज्य की राजधानी था | इसी के बाद से सिखों नें पंजाब को भारत से अलग कर एक ने राष्ट्र खालिस्तानदेश बनानें की मांग पर जोर देना शुरू किया |

इस अलग राष्ट्र की मांग को लेकर कई बार हिंसक प्रदर्शन भी हुए, जिसमें कई लोगों की जान चली गई | वर्ष 1950 में खालिस्तान की मांग लगातार बढ़ रही थी और इसी बीच अकाली दल ने पंजाबी सूबा आंदोलन के नाम से आंदोलन चलाया हालाँकि केंद्र सरकार ने साफ़तौर पर पंजाब को अलग करने से मना कर दिया | जबकि आन्दोलनों के द्वारा अलग सिख देश की मांग उठती रही और 1980 के दशक में ख़ालिस्तान के रूप में स्वायत्त राज्य की मांग और तेज होती गयी, जिसे ख़ालिस्तानी आंदोलन का नाम दिया गया |

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खालिस्तान आंदोलन का इतिहास (History of Khalistan Movement)

देश को स्वतंत्रत करानें के लिए हिन्दू मुस्लिम और सिखों नें मिलकर लड़ाई लड़ी थी | वहीँ जब अंग्रेजों नें देश को भारत को स्वतंत्र करनें की घोषणा की, तो उस समय तक हिन्दू और मुस्लिम समुदाय के बीच एकता लगभग समाप्त हो चुकी थी | मुस्लिम समुदाय के नेता मो० जिन्ना नें अपने लिए एक अलग देश बनानें का प्रस्ताव रखा, हालाँकि इस प्रस्ताव पर हिन्दू नेताओं की सहमती शामिल थी | इस प्रकार वर्ष 1947 में भारत को दो भागों में बाँट दिया गया, जिसका एक भाग मुस्लिम समुदाय को दे दिया गया, जो कि पाकिस्तान के रूप में भारत से अलग हो गया |        

देश के विभाजन के समय सिख समुदाय के लोगों को भी यह अहसास हुआ कि उनकों भी अपना एक वतन चाहिए और स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात पंजाब में पाकिस्तान की तर्ज पर एक अलग देश खालिस्तान बनाने की मांग उठी और इसे लेकर कई बार हिंसक प्रदर्शन भी हुए, जिसमें कई लोगो को अपनी जान गवानी पड़ी | जिसके परिणामस्वरूप वर्ष 1950 में अकाली दल की अगुवाईमें पंजाब सूबा नामक आंदोलन चलाया गया, और पंजाबी सूबा बनाने की मांग की, परन्तु अकाली दल की इस मांग को भारत सरकार नें मानने से इंकार कर दिया | हालाँकि यह आंदोलन यहीं पर समाप्त नहीं हुआ निरंतर चलता रहा |

कहा जाता है, कि 1966 में भारत सरकार पंजाब राज्य को भारत से अलग करने की मांग पर राजी हो गई थी, और यह निर्णय लिया कि वह पंजाब राज्य को अलग कर देगी परन्तु हिमाचल और हरियाणा भारत का ही हिस्सा रहेंगे, परन्तु अकालियों ने सरकार के इस निर्णय पर सहमति नहीं जताई और उन्होंने चंडीगढ़ को पंजाब में मिलानें की मांग रखी | इस प्रकार खालिस्तान आंदोलन लगातार आगे बढ़ता गया, और 1971 में जगजीत सिंह चौहान नामक एक खालिस्तान समर्थक अमेरिका जाकर वहां के एक अखाबर में खालिस्तान देश से जुड़ा एक विज्ञापन दिया, और इस विज्ञापन के माध्यम से उन्होंने लोगो से चन्दा इकट्ठा करने की कोशिश की, ताकि इन पैसों से वह अपनें आंदोलन को और मजबूत कर सकें |

वर्ष 1978 में आनंदपुर साहिब संकल्पलिया गया जिसमें अकालियों ने जगजीत सिंह चौहान के साथ मिलकर अपनी इन मांग को तैयार किया और 80 के दशक में अलग देश की मांग पर खालिस्तान राष्ट्रीय परिषद का गठन किया गया, जिसमें जगजीत सिंह नें अपनें को इसका मुख्य बना लिया | इसी वर्ष जगजीत सिंह चौहान लन्दन पहुचे और वहां पर उन्होंने खालिस्तान देश बननें की घोषणा भी कर दी, इतना ही नहीं जगजीत सिंह नें खालिस्तान राष्ट्रीय परिषद के महासचिव, बलबीर सिंह संधू के साथ मिलकर खालिस्तान की डाक टिकट और मुद्रा भी जारी कर दी थी |

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जनरैल सिंह भिंडरावाले का उदय (Rise of Janrail Singh Bhindranwale)

वर्ष 1980 में खालिस्तान आंदोलन धीरे-धीरे उग्र होने लगा और पंजाब में आतंकी हिंसाओं में जबरदस्त इजाफा हुआ, इसी बीच जनरैल सिंह भिंडरावाले खालिस्तान के सबसे मजबूत नेता के रूप में उभरा | अपनी गिरफ्तारी से बचनें के लिए भिंडरावाले नें अपने समर्थकों के साथ स्वर्ण मंदिर में शरण ले रखी थी, इसका कारण यह था कि भिंडरावाले को लगा कि सरकार कभी भी किसी मंदिर पर हमला नहीं करेगी | इसी बीच 1983 में डीआईजी अटवाल की स्वर्णमंदिर परिसर में ही हत्या कर दी गई |

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ऑपरेशन ब्लू स्टार (Operation Blue Star)

हालाँकि भिंडरावाले का लगातार प्रभाव बढ़नें के साथ ही हिंसक घटनाये बढ़ती जा रही थी | इसी बीच इंदिरा गांधी को खालिस्तानी चरमपंथियों के मंदिर में छुपे होने की जानकारी प्राप्त हुई, भिंडरावाले के बढ़ते प्रभाव और हिंसक घटनाओं को रोकने के लिए भारत सरकार ने स्वर्ण मंदिर में जून, 1984 में आपरेशन ब्लू स्टार को अंजाम दिया गया, जिसमें भिंडरावाले के साथ कई सैंकड़ों समर्थक भी मारे गए |

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प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की मृत्यु (Death of Prime Minister Indira Gandhi)

आपरेशन ब्लू स्टार के दौरान भिंडरावाले की मृत्यु से सिख समुदाय में इंदिरा सरकार के खिलाफ जबरदस्त क्रोध व्याप्त था, और लगभग 4 माह बाद 31 अक्टूबर 1984 को दो सिख सुरक्षाकर्मियों नें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी |

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1984 के बाद खालिस्तान आंदोलन (Khalistan Movement After 1984)

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद भी खालिस्तान आंदोलन यहीं खत्म नहीं हुआ, और कई प्रकार के छोटे-बड़े संगठन बनते गये | एक सिख राष्ट्रवादी नें 23 जून 1985 को एयर इंडिया के विमान में विस्फोट कर दिया, जिसमें 329 लोगों की मृत्यु हो गयी | दोषियों नें इसे भिंडरवाला की मौत का बदला बताया| 10 अगस्त 1986 को ऑपरेशन ब्लूस्टार को लीड करनें वाले पूर्व आर्मी चीफ जनरल एएस वैद्य की दो बाइक सवार बदमाशों नें हत्या कर दी और 31 अगस्‍त 1995 को पंजाब के तत्कालीन सीएम बेअंत सिंह की हत्‍या कर दी, इस प्रकरण में सीएम सहित लगभग 15 अन्य लोगो की मृत्यु हो गयी थी |

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